पञ्चांग – तिथि

पिछले लेख से हम पञ्चांग पर चर्चा कर रहे हैं | जैसा कि पहले बताया, पञ्चांग का प्रथम अंग है दिन अथवा वार | अब दूसरा अंग – तिथि |

जिस तरह अंग्रेज़ी महीनों की तारीख़ें होती हैं, उसी प्रकार भारतीय वैदिक ज्योतिष – Indian Vedic Astrology – के अनुसार हिन्दू काल गणना के अनुसार एक माह में 30 तिथियाँ होती हैं जो दो पक्षों में बंटी होती हैं – शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष | चन्द्र मास शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर कृष्ण अमावस्या तक रहता है और इस प्रकार अमावस्या माह की अन्तिम तिथि हो जाती है – जिसे New Moon Day भी कहा जाता है | माह की पन्द्रहवीं तिथि पूर्णिमा कहलाती है जिसे Full Moon Day भी कहते हैं | अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र का भोग्यांश लगभग बराबर होता है | इस भोग्यांश के घटने बढ़ने से ही तिथि की गणना होती है | उदाहरण के लिए 17 नवम्बर को दोपहर तीन बजकर तीस मिनट के लगभग अमावस्या तिथि आरम्भ हो जाएगी और उस समय सूर्य और चन्द्र दोनों का भोग्यांश आठ अंश है |

हमारे समस्त पर्व और त्यौहार तथा बहुत से रीति रिवाज़ इन्हीं तिथियों पर आधारित होते हैं | इसका कारण सम्भवतः यह है कि जिस तिथि का जो देवता है उस तिथि को उसी देवता की पूजा की जाए |

ये सभी तिथियाँ पाँच वर्गों में विभक्त हैं – नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा | जैसा कि इनके नामों से ही ध्वनित होता है – नन्दा अर्थात आनन्ददायक, भद्रा अर्थात शुभ – किसी भी नवीन कार्य के आरम्भ के लिए जो शुभ हो, जया अर्थात विजय प्रदान करने वाली, रिक्ता अर्थात शून्या – किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जो शुभ न हो, तथा पूर्णा – सिद्धि प्रदान करने वाली | क्योंकि दोनों पक्षों में पन्द्रह पन्द्रह तिथियाँ हैं अतः इन पाँचों तिथियों के तीन चक्र प्रत्येक पक्ष में होते हैं, जो इस प्रकार हैं:-

प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी नन्दा तिथियाँ होती हैं | द्वितीया, सप्तमी तथा द्वादशी भद्रा कहलाती हैं | तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी जया तिथियाँ कही जाती हैं | चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी को रिक्ता तिथियाँ माना गया है | तथा पंचमी, दशमी, पूर्णिमा और अमावस्या को पूर्णा तिथियाँ कहा गया है | इनमें भी नवमी तिथि ऐसी तिथि मानी गई है जिसमें रिक्ता तिथि होते हुए भी कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है |

 

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