पंचांग का तीसरा अंग – नक्षत्र

पञ्चांग के दो अंगों दिन अर्थात वार तथा तिथि के विषय में पहले लिख चुके हैं | अब तीसरा अंग – नक्षत्र |

पञ्चांग का तीसरा अंग है नक्षत्र | 27 नक्षत्र हैं | भाचक्र में प्रत्येक नक्षत्र की अवधि 13 डिग्री 20 मिनट की मानी गई है | जिस राशि में जो नक्षत्र विद्यमान है उस राशि पर उस नक्षत्र का प्रभाव पड़ता है | कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अभिजित को 28वाँ नक्षत्र माना जाता है |

मनुष्य के स्वभाव का, उसके गुणों का ज्ञान करने के लिए नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता है | इसके अतिरिक्त प्रत्येक नक्षत्र का अपना गुण स्वभाव होता है | कोई पुरुष नक्षत्र होता है तो कोई स्त्री नक्षत्र होता है | कोई ऊर्ध्व मुखी नक्षत्र है तो कोई अधोमुखी | प्रकृति के पाँचों तत्वों के अनुसार हर नक्षत्र के तत्व हैं | इन्हीं सबको आधार बनाकर शुभाशुभ मुहूर्त की गणना एक वैदिक ज्योतिषी – Vedic Astrologer – करता है |

हमारे बहुत से पर्व भी चन्द्र अथवा सूर्य नक्षत्र पर आधारित होते हैं | 12 हिन्दू महीनों के नाम भी उन महीनों में उदय होने वाले नक्षत्र के नाम पर होते हैं |

मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र से आरम्भ करके इन 27 नक्षत्रों की स्थिति होती है |

नक्षत्रों से ही तारा, योनि, गण तथा नाडी आदि का ज्ञान किया जाता है | विवाह योग्य वर वधू की कुण्डली मिलाते समय नक्षत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है | यहाँ तक कि नवजात शिशु का जन्म का नाम भी उसके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसके ही आधार पर रखा जाता है |

नक्षत्रों के विषय में विस्तार से अगले अध्यायों में लिखा जाएगा |

 

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