मोक्षदा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी का विशेष महत्त्व है | प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | किस एकादशी के व्रत का क्या महत्त्व है तथा किस प्रकार इस व्रत को करना चाहिए इस सबके विषय में विशेष रूप से पद्मपुराण में विस्तार से उल्लेख मिलता है | यों तो सभी एकादशी महत्त्वपूर्ण होती हैं, किन्तु कुछ एकादशी जैसे षटतिला, निर्जला, देवशयनी, देवोत्थान, तथा मोक्षदा एकादशी का व्रत वे लोग भी करते हैं जो अन्य किसी एकादशी का व्रत नहीं करते | इनमें मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी मोक्षदा एकादशी कहलाती है | पद्मपुराण में भगवान कृष्ण ने कहा है कि मोक्षदा एकादशी के व्रत से समस्त पातकों का नाश होता है:

अतः परं प्रवक्ष्यामि मार्गशीर्षे सिता तु या,

यस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफलं लभेत् ||

मोक्षानामेति सा प्रोक्ता सर्वपापहरा परा,

देवं दामोदरं राजन्पूजयेच्च प्रयत्नतः ||

तुलस्यामंजरीभिश्च धूपैर्दीपै: प्रयत्नतः,

पूर्वेण विधिना चैव दशम्येकादशी तथा ||

मोक्षा चैकादाशी नाम्ना महापातकनाशिनी,

रात्रौ जागरणं कार्यं नृत्यगीतस्त्वैर्मम ||

पद्मपुराण 24/8-11

हे अर्जुन, मैं मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में बताता हूँ जिसके करने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है | मोक्षदा एकादशी समस्त पापों का नाश करती है इसलिए इस दिन रात्रि जागरण करते हुए तुलसी की मंजरी तथा धूप दीपादि द्वारा नृत्य गीतादि के साथ भगवान दामोदर – विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए

शतपथ ब्राहमण के अनुसार वाजपेय यज्ञ एक प्रकार का श्रौतयज्ञ है जो ब्राह्मण और क्षत्रियों के द्वारा किया जाता है और जिसके करने से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है |

श्रुति अर्थात् वेद के मन्त्र और ब्राह्मण नाम के दो अंश हैं | इन दोनों में या दोनों में से किसी एक में सांगोपांग रीति से वर्णित यज्ञों को ‘श्रौतयज्ञ’ कहते हैं और इन यज्ञों के विधान की एक स्वतन्त्र परम्परा है |

ऐसी भी मान्यता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को ही भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की गीतोपदेश दिया था |

मोक्षदा एकादशी की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

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