Graha Dasha

Navagraha Mandala

Graha Dasha

दशा अध्ययन

महान कवि कालिदास ने अपनी प्रसिद्ध रचना मेघदूत में यक्ष के माध्यम से एक बहुत तर्कसंगत बात कही है “कस्यैकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा, नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण |” (मेघदूत 2/49) संसार में कौन ऐसा है जिसे केवल सुख अथवा केवल दुःख प्राप्त होता है ? सुख और दुःख की अवस्था चक्र के आरों की भाँति ऊपर नीचे होती रहती है |

वास्तव में सत्य कथन है | भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार भी यदि देखें तो व्यक्ति की कुण्डली में स्थिति विभिन्न ग्रहों के फल व्यक्ति को प्राप्त होते हैं क्योंकि समस्त ग्रहों का सीधा सम्बन्ध प्राणिमात्र से होता है | ये फल कभी शुभ भी हो सकते हैं और कभी अशुभ भी | किन्तु ये फल कब प्राप्त होंगे और कितने समय के लिए होंगे यह जानना भी आवश्यक होता है, क्योंकि सभी ग्रहों के फलों की एक निश्चित अवधि होती है | ग्रहों की इसी समयावधि को ग्रहों की दशा कहा जाता है और इन्हीं के आधार पर Vedic Astrologer व्यक्ति के जीवन में घटने वाली सम्भावित घटनाओं के समय की जानकारी देते हैं | व्यक्ति की जन्म कुण्डली में विभिन्न ग्रहों की विभिन्न भावों तथा विभिन्न राशियों में स्थिति-युति-दृष्टि इत्यादि के आधार पर तो व्यक्ति के रूप गुण आदि का ज्ञान होता है तथा इनकी दशाओं के आधार पर जीवन में घटने वाली विविध घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है | ग्रहों के सम्भावित शुभाशुभ फल उनकी दशाओं में ही प्राप्त होते हैं | साथ ही किसी एक ग्रह की दशा में अन्य ग्रह भी अपना फल दिखा सकते हैं | इस प्रकार मुख्य ग्रह की दशा महादशा कहलाती है और उस विशिष्ट ग्रह की महादशा में जो अन्य ग्रह अपना फल दिखाते हैं उन दशाओं को अन्तर दशा, प्रत्यन्तर दशा, सूक्ष्म दशा इत्यादि के नाम से जाना जाता है | इन समस्त दशाओं की अवधि नियत होती है |

भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति की आयु का मान 120 वर्ष मानकर उसके आधार पर दशाओं का निर्धारण किया गया है | ये दशाएँ भी विविध शाखाओं में अलग अलग प्रकार से मानी जाती हैं | विंशोत्तरी दशा, योगनी दशा, चर दशा इत्यादि इत्यादि | इनके अतिरिक्त वर्ष कुण्डली की दशाएँ अलग होती हैं | और जैसा कि ऊपर लिखा, इन सब दशाओं की अपनी अपनी निश्चित अवधि होती है | यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में कोई शुभ ग्रह अच्छी स्थिति में स्थित है तो उसकी दशा में उस ग्रह से सम्बन्धित शुभ फल प्राप्त होने की सम्भावना रहती है | किन्तु यदि उस शुभ ग्रह की महादशा में किसी ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा आ जाती है जो किसी भी प्रकार से अशुभ ग्रह है अथवा अशुभ भाव में विराजमान है तो उसका फल भी साथ में प्राप्त होता है | इस प्रकार महादशा और उसमें आने वाली अन्तर्दशाएँ एक दूसरे की पूरक हैं तथा केवल महादशा के ही आधार पर कोई फलकथन नहीं किया जा सकता |

नवग्रहों की विंशोत्तरी दशा के अन्तर्गत सूर्य की महादशा 6 वर्ष की होती है, चन्द्रमा की दस वर्ष की, मंगल की सात वर्ष की, राहु की 18 वर्ष की, गुरु की 16 वर्ष की, शनि की 19 वर्ष की, बुध की 17 वर्ष की, केतु की सात वर्ष की तथा शुक्र की महादशा सबसे अधिक बीस वर्षों की होती है | अब आप लोग सोचेंगे कि ग्रहों के क्रम तो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि इस प्रकार से हैं तो यहाँ हमने अनियमित क्रम में ग्रहों के नाम क्यों लिखे ? बिल्कुल, ग्रहों का क्रम तो यही है, किन्तु ग्रहों की दशाओं का क्रम भी वही है जो ऊपर लिखा है – अर्थात सूर्य की महादशा के बाद चन्द्र की, फिर मंगल की, फिर राहु की, उसके बाद गुरु, फिर शनि, बुध, केतु और शुक्र इस क्रम से जीवन में महादशाएँ आती जाती रहती हैं | जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसके अधिपति ग्रह की दशा प्रथम दशा होती है और उसके बाद उपरोक्त क्रम से दशाओं का फल उसे अपने जीवनकाल में प्राप्त होता रहता है | मान लीजिये किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्रमा मूल नक्षत्र में स्थित है | तो मूल नक्षत्र का स्वामी है केतु, और इस प्रकार उस व्यक्ति की जन्म के समय केतु की महादशा होगी |

विषय बहुत विशाल है जिस पर एक ही अध्याय में चर्चा नही की जा सकती | किन्तु इस सबसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारतीय वैदिक ज्योतिष पूर्ण रूप से एक विज्ञान है, जिसके अपने सूत्र हैं, अपना गणित है, अपने तर्क हैं, अपनी परिभाषाएँ हैं, यदि भली भाँति इन सबके आधार पर व्यक्ति की जन्म कुण्डली का अध्ययन किया जाए तो काफ़ी हद तक व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसका उचित मार्ग दर्शन किया जा सकता है…

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