सन्तान गोपाल मन्त्र

एक अच्छी स्वस्थ सन्तान हर माता पिता का सपना होता है | किन्तु किसी कारणवश महिला Conceive नहीं कर पाती या गर्भपात हो जाता है तो उनका ये सपना जैसे टूट कर बिखर जाता है | कई बार तो एक दूसरे पर दोषारोपण का सिलसिला भी शुरू हो जाता है | पतिपक्ष के लोग पत्नी को गर्भ धारण करने में असमर्थ बताने लगते हैं तो पत्नी पति को नपुंसक बताने में नहीं हिचकिचाती | ऐसी स्थिति में मेडिकल साइंस सहायता करती है | आजकल मेडिकल साइंस इतनी एडवांस हो गई है कि सन्तान के इच्छुक दम्पतियों को चिन्ता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं | किन्तु फिर भी हैरान परेशान दम्पति ज्योतिषियों के चक्कर लगाते रहते हैं कि कहीं से तो कोई आशा की किरण दिखाई दे | प्रायः सभी Vedic Astrologers उनकी कुण्डली के पंचम भाव का अध्ययन करके उन्हें उपाय सुझाते हैं और साथ में सन्तान गोपाल मन्त्र के जाप की सलाह देते हैं |

हमारे पास भी इस समस्या से त्रस्त लोग आते हैं | कल भी एक ऐसी ही लड़की जब हमारे पास आई तो सोचा क्यों न ये सन्तान गोपाल मन्त्र सभी को उपलब्ध करा दिया जाए | मान्यता है कि इस मन्त्र का प्रतिदिन 108 बार जप करने से सन्तान प्राप्ति की आशा बढ़ जाती है | तो ये है सन्तान गोपाल मन्त्र :

“देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते |

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ||”

आप सोचेंगे इसमें तो केवल पुत्र की कामना की गई है | तो ऐसा नहीं है | “तनय” से अर्थ केवल पुत्र से नहीं लेना चाहिए, इसका मूलार्थ है “सन्तान” – फिर चाहे वह पुत्र हो या पुत्री – “तनोति कुलं यः इति तनयः” अर्थात जिसके कारण वंश की वृद्धि हो वह तनय यानी सन्तान | जो भी अपने तन से – शरीर से – उत्पन्न हो वह तनय | पुत्र और पुत्री दोनों ही अपने शरीर से उत्पन्न होते हैं, दोनों के ही जन्म से कुल की वृद्धि होती है, अतः “तनय” शब्द से दोनों को ही ग्रहण किया जाना चाहिए |

मन्त्र जाप से विचारों में सकारात्मकता आती है, चारों ओर का वातावरण ऊर्जा से भर जाता है और जिस संकल्प के साथ हम किसी मन्त्र का जाप कर रहे हैं – हर पल एक ही संकल्प बना रहने से संकल्प अवश्य सिद्ध होता है ऐसा हमारा मानना है |

अन्त में, अपने संकल्प की दृढ़ता, विचारों की परिपक्वता और शुद्धि तथा वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए मन्त्र जाप कीजिए – क्योंकि जिस बात के विषय में हम लगातार सोचते रहेंगे वह अवश्य पूर्ण होती है, किन्तु अपनी डॉक्टर के बताए मार्ग का अनुसरण अवश्य कीजिए… 

धनु राशि में सूर्य का संक्रमण


यों तो ग्रहों का भाचक्र में भ्रमण एक खगोलीय घटना है जो अपने नियमित अन्तराल पर घटती रहती है | किन्तु Vedic Astrology की दृष्टि से ग्रहों के संक्रमण का प्रकृति पर प्रत्यक्ष प्रभाव होता है और मानव भी उस प्रभाव से अछूता नहीं रहता | आज प्रातः 03:00 पर सूर्य का संक्रमण धनु राशि में हुआ है और यहाँ भगवान भास्कर पूरा एक माह रहने वाले हैं | हम सभी जानते हैं कि समस्त चराचर जगत को ऊर्जा तथा पुनर्जीवन सूर्य से ही प्राप्त होता है | यही कारण है कि सूर्य को प्राणों का अथवा आत्मा का कारक माना जाता है | सूर्य की राशि सिंह है, उच्च राशि मेष है और नीच राशि तुला है | आइये जानते हैं विभिन्न राशियों पर सूर्य के धनु राशि में गोचर का क्या सम्भावित प्रभाव मानव मात्र पर हो सकता है | यह प्रभाव चन्द्रमा की राशि को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है और चन्द्रमा एक राशि में पूरे चौबीस घंटे रहता है तथा उन चौबीस घण्टों में हज़ारों बच्चों का जन्म होता है | आवश्यक नहीं कि सबके लिए नीचे लिखी बातें सत्य सिद्ध हो जाएँ | किसी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन करते समय केवल एक ही तथ्य का आकलन नहीं किया जाता है अपितु बहुत से सूत्रों के आधार पर किसी कुण्डली का अध्ययन किया जाता है तब किसी सम्भावित परिणाम पर पहुँच सकते हैं | साथ ही, हर एक वर्ष में सूर्य पूरी बारह राशियों में भ्रमण करता है अतः आवश्यक नहीं कि हर वर्ष सूर्य के किसी विशिष्ट राशि में गोचर होने पर समान परिणाम ही परिलक्षित हों | इसलिए अधिक सत्य फलकथन के लिए तो आपको किसी अच्छे वैदिक ज्योतिषी – Vedic Astrologer – से स्वयं मिलकर ही कुण्डली का समग्र अध्ययन कराना होगा | तथापि, यदि दस प्रतिशत लोगों को भी इसका लाभ मिल सका तो अपना ये पयास सफल मानेंगे…

मेष : मेष राशि सूर्य की मित्र राशि है और यहाँ आकर सूर्य उच्च का हो जाता है | मेष राशि के लिए सूर्य पंचमेश होकर नवम भाव में गोचर कर रहा है | जो न केवल अपने लिए बल्कि सन्तान के लिए भी भाग्यवर्द्धक है | आपको किसी प्रकार के सम्मान आदि के लिए भी प्रस्तावित किया जा सकता है अथवा आपकी पदोन्नति हो सकती है | परिवार में कोई शुभ कार्य हो सकता है | किसी प्रकार का पूजा अनुष्ठान आदि का आयोजन किया जा सकता है | आप सपरिवार तीर्थयात्रा पर जाने का प्लान भी बना सकते हैं | आप उच्च शिक्षा के लिए भी अग्रसर हो सकते हैं | आपके लिए सूर्य का धनु राशि में गोचर अत्यन्त शुभ प्रतीत होता है |

वृषभ : वृषभ राशि से धनु राशि अष्टम भाव में आ जाती है और सूर्य चतुर्थेश होकर धनु में अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | आपके लिए सूर्य का धनु राशि में गोचर कुछ अधिक अनुकूल नहीं प्रतीत होता | पारिवारिक स्तर पर अचानक ही कुछ ऐसी घटनाएँ घट सकती हैं जिनके प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं | अपनी जीवन शैली में सुधार करेंगे और अपने आचरण को शुद्ध रखेंगे तो किसी भी प्रतिकूल समस्या से बच सकते हैं | ध्यान प्राणायाम आदि में आपकी रूचि बढ़ सकती है | अपने तथा अपने माता पिता के स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है | ड्राइविंग के समय सावधान रहने की आवश्यकता है | आदित्य हृदय स्तोत्र अथवा गायत्री मन्त्र का जाप आपके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है |

मिथुन : आपके लिए तृतीयेश होकर सूर्य धनु राशि में सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | इस गोचर को बहुत अधिक अनुकूल नहीं कहा जा सकता | विशेष रूप से जीवन साथी के साथ किसी प्रकार का मतभेद हो सकता है | यदि पार्टनरशिप में कार्य कर रहे हैं तो वहाँ भी सम्बन्धों में किसी प्रकार का वैमनस्य उत्पन्न हो सकता है | आप ज़रा सी बात पर भड़क सकते हैं, जो सम्बन्धों के लिए हानिकारक होगा | इस सबसे बचना है तो आपको अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखना होगा | आपके लिए भी आदित्य हृदय स्तोत्र अथवा गायत्री मन्त्र का जाप करना उचित रहेगा |

कर्क : कर्क राशि के लिए सूर्य द्वितीयेश होकर धनु राशि में छठे भाव में गोचर कर रहा है | इस गोचर को एक बहुत शक्तिशाली गोचर के रूप में देखा जाता है | आपके जितने भी छिपे हुए अथवा प्रत्यक्ष विरोधी अथवा शत्रु हैं उन सबके लिए समस्या उत्पन्न हो सकती है | अपने विरोधियों पर आपको विजय प्राप्त हो सकती है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसकी भी समाप्ति होकर अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सकता है | आपकी वाणी ओज पूर्ण रहेगी तथा उसका प्रभाव दूसरों पर होगा | स्वास्थ्य के लिए पित्त से सम्बन्धित किसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है इसलिए अपने खान पान की आदत में सुधार करना आवश्यक है | साथ ही किसी को इस समय उधार न दें | किसी document पर sign करने से पूर्व अच्छी तरह उसका अध्ययन अवश्य कर लें | ध्यान रहे, किसी भी समस्या से बचने के लिए सबसे अच्छा उपाय होता है सोच समझकर आगे बढ़ना |

सिंह : आपके लिए सूर्य आपका लग्नेश होकर धनु राशि में पंचम भाव में गोचर कर रहा है | यह गोचर अत्यन्त शुभ गोचर माना जाता है | अध्ययन के लिए, उच्च शिक्षा के लिए समय अनुकूल है | जो लोग मन्त्र आदि को सिद्ध करना चाहते हैं अथवा ध्यान अध्यात्म आदि के मार्ग पर अग्रसर हैं उनके लिए यह गोचर अत्यन्त अनुकूल है | किन्तु गर्भवती महिलाओं के लिए यह गोचर उतना शुभ नहीं माना जा सकता | किसी भी समस्या से बचने के लिए निश्चित समय पर डॉक्टर से जाँच कराना और डॉक्टर के दिए निर्देशों का पूर्ण रूप से पालन करना आपके हित में होगा | आर्थिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल माना जाता है | कोई नया कार्य भी आरम्भ कर सकते हैं जो आपके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है | सन्तान के स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक है | वैवाहिक जीवन में सम्भव है कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ जाए | प्रातः आदित्य हृदय स्तोत्र के साथ सूर्य देव का अभिषेक आपके लिए उत्तम रहेगा |

कन्या : आपके लिए सूर्य आपकी लग्न से द्वादशेश होकर धनु राशि में आपके चतुर्थ भाव में गोचर कर रहा है | इस प्रकार के गोचर से संकेत मिलता है कि आपको किसी आवश्यक कार्यवश परिवार से दूर रहना पड़ सकता है | सम्भव है आप शिक्षा प्राप्त करने के लिए किसी दूसरे स्थान पर चले जाएँ | यह भी सम्भव है कि आपके पिता को किन्हीं आवश्यक कारणों से कहीं दूर यात्रा पर जाना पड़ जाए | आर्थिक दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है | प्रॉपर्टी को बेचने के लिए समय अनुकूल प्रतीत होता है किन्तु खरीदने में अधिक धन का व्यय हो सकता है | लीवर से सम्बन्धित किसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है | ड्राइविंग करते समय सावधान रहने की आवश्यकता है | साथ ही यदि माता पिता वृद्ध हैं तो उनके स्वास्थ्य के प्रति भी सावधान रहने की आवश्यकता है | प्रातः उठकर सूर्य को जल देना आपके अनुकूल रहेगा |

तुला : तुला राशि वालों के लिए सूर्य एकादशेश हो जाता है | एकादशेश होकर धनु राशि में तृतीय भाव में गोचर कर रहा है | आपके भाई बहनों को आपसे अर्थ लाभ की सम्भावना है | साथ ही मित्रों और अधिकारी वर्ग का सहयोग प्राप्त होता रहेगा | कुछ नए मित्र भी बन सकते हैं जो आपके लिए कुछ नए प्रोजेक्ट्स लेकर आएँगे जिनके कारण आपको अर्थलाभ की भी सम्भावना है | यदि आपकी कुण्डली में अन्य अनुकूलताएँ इस समय हो रही हैं तो आप इन नए प्रोजेक्ट्स के साथ आगे बढ़ सकते हैं | कार्याधिक्य के कारण आपके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना है, अतः बीच बीच में कार्य से अवकाश लेने की भी आवश्यकता है |

वृश्चिक : वृश्चिक राशि वालों के लिए सूर्य उनके दशम भाव का स्वामी है | दशमेश सूर्य धनु राशि में द्वितीय भाव में गोचर कर रहा है जो कार्य की दृष्टि से तथा अर्थ लाभ की दृष्टि अनुकूल है और आपका भविष्य भी आर्थिक रूप से सुरक्षित होने का समय प्रतीत होता है | कार्यक्षेत्र में अनुकूलता बनी रहने की सम्भावना है | किन्तु आपके मन में अपने परिवार और कार्य को लेकर कुछ द्विविधाएँ हो सकती हैं | सूर्यदेव की उपासना तथा ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास इन द्विविधाओं से बचने के उपाय हैं | आपकी वाणी इस समय विशेष रूप से ओजपूर्ण रहेगी जिसका आपको लाभ तथा यश भी प्राप्त होगा | आँखों से सम्बन्धित किसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है |

धनु : आपके लिए सूर्य आपका भाग्येश होकर लग्न में गोचर कर रहा है जो भाग्यवर्द्धक है | आवश्यकता है अपनी योग्यताओं और सम्भावनाओं पर भली भाँति पुनर्विचार करके उनका समय पर सदुपयोग करने की | अपने विचारों और कर्म से नैराश्य का भाव त्याग कर आशावादी बनिए | समय का लाभ उठाइये क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो फिर वापस नहीं आता | सरकारी स्तर पर, उच्चाधिकारियों से तथा पिता की ओर से अनुकूल सहयोग प्राप्त होगा | धन और यश में वृद्धि का समय है | वैवाहिक सम्बन्ध में व्यर्थ के अहंकार से बचने का प्रयास कीजिए | स्वास्थ्य की दृष्टि से कुछ सावधान रहने की आवश्यकता है |

मकर : आपके लिए सूर्य अष्टमेश होकर द्वादश भाव में गोचर कर रहा है | आपका लग्नाधिपति शनि है जो अष्टमेश सूर्य का शत्रु भी है | यह गोचर आपके लिए शुभ नहीं कहा जा सकता | आपको विशेष रूप से अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है | कोई भी ऐसा कार्य मत कीजिये जिसके कारण आपके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ने की सम्भावना हो | अपनी गतिविधियों का निरीक्षण करके स्वयं को एक बेहतर इन्सान बनाने का प्रयास कीजिए | आपको किसी ऐसे स्थान की यात्रा करनी पड़ सकती है जहाँ जाने की आपकी इच्छा न हो और वहाँ जाकर आपका स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है | गायत्री मन्त्र का जाप आपके लिए उत्तम उपाय है |

कुम्भ : मकर राशि की ही भाँति कुम्भ राशि का स्वामी भी शनि है | सूर्य आपका सप्तमेश होकर आपके एकादश भाव में गोचर कर रहा है | शनि यद्यपि सूर्य का शत्रु गह है, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि आपको अपने जीवन साथी के द्वारा अथवा आपके जीवन साथी को अर्थ लाभ भी हो सकता है | आपके व्यवसाय में भी वृद्धि हो सकती है | यदि किसी नौकरी में हैं तो आपकी पदोन्नति की भी सम्भावना है | अपने मित्रों के साथ मधुर व्यवहार रखेंगे तथा बॉस का सम्मान करेंगे तो उनसे व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत स्तर पर अनुकूलता प्राप्त हो सकती है | जीवन साथी की खोज इस अवधि में पूर्ण हो सकती है |

मीन : मीन राशि वालों के लिए सूर्य षष्ठेश होकर दशम भाव अर्थात profession के भाव में गोचर कर रहा है | बहुत अच्छी स्थिति में गोचर कर रहा है | जितनी भी नकारात्मकता अथवा निराशा आपके विचारों अथवा कार्य के प्रति है वह सब इस अवधि में समाप्त हो सकती है | अधिकारी वर्ग की ओर से लाभ की भी सम्भावना है | आपकी सभी योजनाएँ पूर्ण हो सकती हैं अथवा उनमें अनुकूल दिशा में प्रगति हो सकती है | नौकरी की तलाश में हैं अथवा कोई नया व्यवसाय आरम्भ करना चाहते हैं तो उसमें भी सफलता प्राप्त होने की सम्भावना है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो या तो उससे मुक्ति प्राप्त हो सकती है अथवा उसके अनुकूल दिशा में आगे बढ़ने की सम्भावना है |

अन्त में, सदा की भाँति इतना अवश्य कहेंगे कि यदि कर्म करते हुए भी सफलता नहीं प्राप्त हो रही हो तो किसी अच्छे ज्योतिषी – A Good Vedic Astrologer – के पास दिशानिर्देश के लिए अवश्य जाइए, किन्तु अपने कर्म और प्रयासों के प्रति निष्ठावान रहिये – क्योंकि केवल आपके कर्म और उचित प्रयास ही आपको जीवन में सफल बनाएँगे…

शीत की पीत भोर

भोर के केसर जैसी लालिमायुत रश्मि पथ पर

धीरे धीरे आगे बढ़ता / ऊपर उठता सूर्य

संदेसा देता है कि उठो, जागो मीठी नींद से

देखो, पत्तों पर गिरे मोती भी अब / पिघलने लगेंगे धीरे धीरे

छँटने लगेगा निशा का मायावी अन्धकार

और चहचहाने लगेंगे पंछी

सुनाते हुए रात के सपनों की रंगीन कहानियाँ

सोए पड़े पुष्प भी धीरे धीरे नींद से जागकर

खोलने लगेंगे अपनी पंखुड़ियों की स्वप्निल आँखें

गुँजाने लगेगा उपवन भँवरों की मधुर गुन्जारों से

और केसरिया लालिमा की सौतन बनी धवल धूप

पीछे धकेलती हुई उस सूर्यप्रियतमा को

अँगड़ाई लेती जाग जाएगी नींद से

जिसके शीतल ताप से आह्लादित प्रकृति

मुस्कुरा उठेगी / अनावृत करती रात के रहस्यों को

ऐसे में आओ हम भी

अलसाए अंगों को अँगड़ाई लेकर करें शिथिल

भर लें रोम रोम में शीतल मन्द पवन की मादकता

डूबते हुए प्रकृति के इस सुहाने हास-विलास में

जो करती रहती है नित नई संरचना

क्योंकि शीत की ये सुहानी पीत भोर

करती है नवीन आशा का संचार कण कण में…

 

 

 

 

श्री पार्श्वनाथाय नमः

ॐ ह्रीं अर्ह श्री पार्श्वनाथाय नमः

आज पौष कृष्ण एकादशी को जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की जयन्ती मनाई जा रही है | भगवान पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 3 हजार वर्ष पूर्व वाराणसी में इक्ष्वाकु वंश के महाराज अश्वसेन की पत्नी महारानी वामा के गर्भ से हुआ था | जन्म के समय ही इनके शरीर पर सर्प का चिह्न था | महारानी वामा ने गर्भावस्था में भी एक बार स्वप्न में सर्प देखा था इसलिए बच्चे का नाम पार्श्व रख दिया | राजकुमार होने के कारण उनका प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त समृद्ध वातावरण में व्यतीत हुआ । एक दिन उन्होंने पुरवासियों को पूजा की सामाग्री लेकर एक दिशा में जाते देखा | पार्श्व भी उनके पीछे चल दिए | वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी पंचाग्नि जला रहा था और अग्नि में एक सर्प के जोड़े की बलि दी जा रही थी | तब पार्श्व ने कहा जिस धर्म में दया का भाव न हो वह धर्म निरर्थक है |

इसी प्रकार की कुछ अन्य कथाएँ भी हैं |

माना जाता है कि तीस वर्ष की आयु में इन्होने गृहत्याग करके जैन धर्म की दीक्षा ली | काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ | उसके बाद उन्होंने अनेक देशों का भ्रमण किया तथा अनेक लोगों को दीक्षित किया | आज जैन समाज जिस रूप में है उस चतुर्विध संघ – जिसमें मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका सम्मिलित होते हैं – की स्थापना का श्रेय भी पार्श्वनाथ को ही जाता है |

चतुर्विध संघ में प्रत्येक गण एक गणधर के अन्तर्गत कार्य करता था । स्त्री पुरुष में अथवा छोटे बड़े में कोई भेद नहीं माना जाता था – सभी अनुयायियों को समान माना जाता था | ऐसा भी माना जाता है कि भगवान बुद्ध के भी अधिकाँश पूर्वज पार्श्वनाथ के अनुयायी थे |

अपना निर्वाण निकट जान पार्श्वनाथ झारखण्ड में स्थित सम्मेद शिखर जी पर तपस्या के लिए चले गए जहाँ श्रावण शुक्ल अष्टमी को उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ |

जैन पुराणों के अनुसार तीर्थंकर बनने से पूर्व पार्श्नाथ के नौ जन्म हुए थे, जिनमें से प्रथम जन्म में वे एक ब्राह्मण थे, दूसरे जन्म में हाथी, तीसरे जन्म में स्वर्ग के देवता, चतुर्थ में एक क्षत्रिय राजा, पंचम में पुनः देव, छठे में चक्रवर्ती सम्राट, सप्तम में पुनः देवता, अष्टम में पुनः एक राजा और नवम जन्म में इन्द्र के रूप में जन्म लिया | इन्हीं पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों के फलस्वरूप दशम जन्म में पार्श्व के रूप में जन्म लेकर ये तेईसवें तीर्थंकर बने |

इनके विवाह के विषय में भी मतभेद है | दिगम्बर सम्प्रदाय के अनुसार ये बाल ब्रह्मचारी थे | जबकि श्वेताम्बर मतावलम्बियों में कुछ इन्हें दिगम्बरों की ही भाँति बाल ब्रह्मचारी मानते हैं और कुछ विवाहित मानते हैं | विवाहित मानने वालों के अनुसार गृहस्थ का त्याग करके ये तपस्या के लिए गए थे |

मान्यताएँ जो भी हों, इतना तो सत्य है कि भगवान पार्श्वनाथ ने मानव मूल्यों के संरक्षण तथा मानव मात्र के उत्थान के लिए तप किया, अपने शिष्यों को धर्म में दीक्षित किया और जन कल्याण के कार्य करते हुए ही अन्त में निर्वाण प्राप्त किया | ऐसे भगवान पार्श्वनाथ की जयन्ती की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ – इस भावना के साथ  कि हम सब भी उन्हीं के समान मानव मात्र के कल्याण के निमित्त कर्म करते रहें…

समत्त्व

आज का विचार:

“परम तत्त्व में लीन” होने का अर्थ मृत्यु की प्राप्ति नहीं है… न ही “मोक्ष” का अर्थ शरीर त्यागना है… अपितु “मोक्ष” अथवा “परम तत्त्व में  लीन” होने का अर्थ है द्वत्व का त्याग… द्वैत की भावना त्याग… सब कुछ के साथ समभाव हो जाना… सत्य तो यह है कि व्यक्ति जब परम तत्त्व में लीन होना चाहता है तो न तो वहाँ मोक्ष प्राप्ति की लालसा रहती है और न ही मैं का भाव… वहाँ केवल एक ही भाव शेष रहता है, और वह है “सोSमस्मि” का भाव…

व्यक्तिगत मानवीय सम्बन्ध भी इसी प्रकार होते हैं | वहाँ सभी प्रकार का “दुई” का भाव समाप्त होकर केवल “एकत्त्व” का भाव शेष रहा जाता है | और जब सब कुछ के प्रति “एकत्त्व” का भाव आ गया, सब कुछ के प्रति “समत्व” का भाव आ गया तब किसी भी प्रकार के दुर्भाव के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह जाता…

हम सब एक दूसरे के प्रति इसी प्रकार का “एकत्व” अथवा “समत्व” का भाव रखें यही कामना है…

पञ्चांग का चतुर्थ अंग योग

वार, तिथि और नक्षत्र के विषय में संक्षिप्त में अब तक लिख चुके हैं | अब पञ्चांग का चतुर्थ अंग है योग | सूर्य तथा चन्द्रमा की स्थितियों के आधार पर योग की गणना की जाती है | सूर्य और चन्द्र की परस्पर एक विशिष्ट दूरी एक एक योग बनता है | प्रत्येक योग 13 डिग्री 20 मिनट का होता है और कुल 27 योग होते हैं | जिनके नाम हैं: विषकुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातिपत, वरीयान, परिधि, शिव, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति | इन सभी योगों के गुण धर्म इनके नामों के अनुसार ही होते हैं | उदाहरण के लिए विषकुम्भ योग को उतना अच्छा नहीं माना जाता जबकि प्रीति, आयुष्मान आदि शुभ योग माने जाते हैं |

27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा इन अशुभ मुहूर्तों में किसी प्रकार के भी शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है | इनके नामों से ही ज्ञात हो जाता है कि इन्हें किसलिए अशुभ माना गया है | ये अशुभ योग हैं: विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति |

अन्त में, शुभाशुभ मुहूर्त का विचार अवश्य कीजिए पर अन्ध विश्वास मत रखिये | व्यक्ति का कर्म सबसे प्रधान होता है | मान लीजिये आपको कहीं किसी नौकरी के Interview के लिए जाना हो और उस दिन कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल रहा हो तो क्या साक्षात्कार के लाइए नहीं जाएँगे ?

अतः यदि कार्य आवश्यक ही हो और कोई शुभ मुहूर्त नहीं भी मिल रहा हो तो भी Vedic Astrologer व्यक्ति को इस शुभाशुभ मुहूर्त के भय से ऊपर उठकर सकारात्मक भाव के साथ कर्म करने की ही सलाह देते हैं…

 

 

 

न जायते म्रियते वा कदाचित…

स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयं प्रकाशित तथा नित्य शुद्ध बुद्ध चैतन्य स्वरूप हमारी अपनी आत्मा को किसी अन्य स्रोत से चेतना अथवा प्रकाश पाने की आवश्यकता ही नहीं – और यही है परमात्मतत्व – परमात्मा – इसे पाने के लिए कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं – आवश्यकता है तो अपने भीतर झाँकने की – पैठने की अपने भीतर – और वही है सबसे कठिन कार्य…

उपनिषदों में तो आत्मा को कहा ही गया है स्वयं प्रकाश | जो स्वयं प्रकाश है उसे प्रकाशित करने की आवश्यकता ही नहीं है | आवश्यकता है इस प्रकाश को समझ कर उससे दिशा प्राप्त कर अपनी आत्मा की चैतन्यता को समझ आगे बढ़ जाने की |

यदि स्वयं से ही अपरिचित रह गए तो आगे बढ़ना व्यर्थ है | आत्मा की सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत हर अवस्था में चैतन्य विद्यमान रहता है, अतः चैतन्य आत्मा का शुद्ध स्वभाव है | चैतन्य होने के कारण आत्मा स्वयं प्रकाश है तथा जगत को भी प्रकाशित करता है | व्यक्ति का सबसे बड़ा गुरु भी यही होता है और यही ज्ञातव्य भी होता है | यह शाश्वत है, अनादि है, अनन्त है – यही कारण है कि न यह कभी जन्मता है, न मृत्यु को प्राप्त होता है, न यह किसी भौतिक (जो पञ्चभूतों से निर्मित हो) पदार्थ की भाँति गल सकता है, न जल सकता है | इनमें से कोई भी गुण धर्म आत्मा का नहीं है |

न जायते म्रियते वा कदाचित्, नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |

अजो नित्यः शाश्वतोSयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||

गीता – 2/20

ऐसी अविनाशी तथा निरन्तर विद्यमान इसी आत्मा के रहस्य को – परमात्म तत्त्व को – यदि समझ गए तो फिर परमात्मा को अन्यत्र ढूँढने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती – वह तो अपने भीतर ही निहित होता है…

आध्यात्मिक जिज्ञासु भौतिक सुखों से ऊपर उठकर इसी परमात्मा को समझने का प्रयास करते हैं, जो निश्चित रूप से अत्यन्त कठिन मार्ग है | किन्तु यदि हमने हर व्यक्ति की आत्मा को अपने सामान समझ लिया तो जानिये हम परमात्मा को समझने की दिशा में अग्रसर हैं…

मोक्षदा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी का विशेष महत्त्व है | प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | किस एकादशी के व्रत का क्या महत्त्व है तथा किस प्रकार इस व्रत को करना चाहिए इस सबके विषय में विशेष रूप से पद्मपुराण में विस्तार से उल्लेख मिलता है | यों तो सभी एकादशी महत्त्वपूर्ण होती हैं, किन्तु कुछ एकादशी जैसे षटतिला, निर्जला, देवशयनी, देवोत्थान, तथा मोक्षदा एकादशी का व्रत वे लोग भी करते हैं जो अन्य किसी एकादशी का व्रत नहीं करते | इनमें मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी मोक्षदा एकादशी कहलाती है | पद्मपुराण में भगवान कृष्ण ने कहा है कि मोक्षदा एकादशी के व्रत से समस्त पातकों का नाश होता है:

अतः परं प्रवक्ष्यामि मार्गशीर्षे सिता तु या,

यस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफलं लभेत् ||

मोक्षानामेति सा प्रोक्ता सर्वपापहरा परा,

देवं दामोदरं राजन्पूजयेच्च प्रयत्नतः ||

तुलस्यामंजरीभिश्च धूपैर्दीपै: प्रयत्नतः,

पूर्वेण विधिना चैव दशम्येकादशी तथा ||

मोक्षा चैकादाशी नाम्ना महापातकनाशिनी,

रात्रौ जागरणं कार्यं नृत्यगीतस्त्वैर्मम ||

पद्मपुराण 24/8-11

हे अर्जुन, मैं मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में बताता हूँ जिसके करने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है | मोक्षदा एकादशी समस्त पापों का नाश करती है इसलिए इस दिन रात्रि जागरण करते हुए तुलसी की मंजरी तथा धूप दीपादि द्वारा नृत्य गीतादि के साथ भगवान दामोदर – विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए

शतपथ ब्राहमण के अनुसार वाजपेय यज्ञ एक प्रकार का श्रौतयज्ञ है जो ब्राह्मण और क्षत्रियों के द्वारा किया जाता है और जिसके करने से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है |

श्रुति अर्थात् वेद के मन्त्र और ब्राह्मण नाम के दो अंश हैं | इन दोनों में या दोनों में से किसी एक में सांगोपांग रीति से वर्णित यज्ञों को ‘श्रौतयज्ञ’ कहते हैं और इन यज्ञों के विधान की एक स्वतन्त्र परम्परा है |

ऐसी भी मान्यता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को ही भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की गीतोपदेश दिया था |

मोक्षदा एकादशी की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

पंचांग का तीसरा अंग – नक्षत्र

पञ्चांग के दो अंगों दिन अर्थात वार तथा तिथि के विषय में पहले लिख चुके हैं | अब तीसरा अंग – नक्षत्र |

पञ्चांग का तीसरा अंग है नक्षत्र | 27 नक्षत्र हैं | भाचक्र में प्रत्येक नक्षत्र की अवधि 13 डिग्री 20 मिनट की मानी गई है | जिस राशि में जो नक्षत्र विद्यमान है उस राशि पर उस नक्षत्र का प्रभाव पड़ता है | कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अभिजित को 28वाँ नक्षत्र माना जाता है |

मनुष्य के स्वभाव का, उसके गुणों का ज्ञान करने के लिए नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता है | इसके अतिरिक्त प्रत्येक नक्षत्र का अपना गुण स्वभाव होता है | कोई पुरुष नक्षत्र होता है तो कोई स्त्री नक्षत्र होता है | कोई ऊर्ध्व मुखी नक्षत्र है तो कोई अधोमुखी | प्रकृति के पाँचों तत्वों के अनुसार हर नक्षत्र के तत्व हैं | इन्हीं सबको आधार बनाकर शुभाशुभ मुहूर्त की गणना एक वैदिक ज्योतिषी – Vedic Astrologer – करता है |

हमारे बहुत से पर्व भी चन्द्र अथवा सूर्य नक्षत्र पर आधारित होते हैं | 12 हिन्दू महीनों के नाम भी उन महीनों में उदय होने वाले नक्षत्र के नाम पर होते हैं |

मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र से आरम्भ करके इन 27 नक्षत्रों की स्थिति होती है |

नक्षत्रों से ही तारा, योनि, गण तथा नाडी आदि का ज्ञान किया जाता है | विवाह योग्य वर वधू की कुण्डली मिलाते समय नक्षत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है | यहाँ तक कि नवजात शिशु का जन्म का नाम भी उसके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसके ही आधार पर रखा जाता है |

नक्षत्रों के विषय में विस्तार से अगले अध्यायों में लिखा जाएगा |

 

पञ्चांग – तिथि

पिछले लेख से हम पञ्चांग पर चर्चा कर रहे हैं | जैसा कि पहले बताया, पञ्चांग का प्रथम अंग है दिन अथवा वार | अब दूसरा अंग – तिथि |

जिस तरह अंग्रेज़ी महीनों की तारीख़ें होती हैं, उसी प्रकार भारतीय वैदिक ज्योतिष – Indian Vedic Astrology – के अनुसार हिन्दू काल गणना के अनुसार एक माह में 30 तिथियाँ होती हैं जो दो पक्षों में बंटी होती हैं – शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष | चन्द्र मास शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर कृष्ण अमावस्या तक रहता है और इस प्रकार अमावस्या माह की अन्तिम तिथि हो जाती है – जिसे New Moon Day भी कहा जाता है | माह की पन्द्रहवीं तिथि पूर्णिमा कहलाती है जिसे Full Moon Day भी कहते हैं | अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र का भोग्यांश लगभग बराबर होता है | इस भोग्यांश के घटने बढ़ने से ही तिथि की गणना होती है | उदाहरण के लिए 17 नवम्बर को दोपहर तीन बजकर तीस मिनट के लगभग अमावस्या तिथि आरम्भ हो जाएगी और उस समय सूर्य और चन्द्र दोनों का भोग्यांश आठ अंश है |

हमारे समस्त पर्व और त्यौहार तथा बहुत से रीति रिवाज़ इन्हीं तिथियों पर आधारित होते हैं | इसका कारण सम्भवतः यह है कि जिस तिथि का जो देवता है उस तिथि को उसी देवता की पूजा की जाए |

ये सभी तिथियाँ पाँच वर्गों में विभक्त हैं – नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा | जैसा कि इनके नामों से ही ध्वनित होता है – नन्दा अर्थात आनन्ददायक, भद्रा अर्थात शुभ – किसी भी नवीन कार्य के आरम्भ के लिए जो शुभ हो, जया अर्थात विजय प्रदान करने वाली, रिक्ता अर्थात शून्या – किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जो शुभ न हो, तथा पूर्णा – सिद्धि प्रदान करने वाली | क्योंकि दोनों पक्षों में पन्द्रह पन्द्रह तिथियाँ हैं अतः इन पाँचों तिथियों के तीन चक्र प्रत्येक पक्ष में होते हैं, जो इस प्रकार हैं:-

प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी नन्दा तिथियाँ होती हैं | द्वितीया, सप्तमी तथा द्वादशी भद्रा कहलाती हैं | तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी जया तिथियाँ कही जाती हैं | चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी को रिक्ता तिथियाँ माना गया है | तथा पंचमी, दशमी, पूर्णिमा और अमावस्या को पूर्णा तिथियाँ कहा गया है | इनमें भी नवमी तिथि ऐसी तिथि मानी गई है जिसमें रिक्ता तिथि होते हुए भी कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है |